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गुलमोहर: राधा शैलेन्द्र द्वारा रचित कविता
चलो कुछ यादें टटोले,उन लम्हों को समेटे
जो बितायें तुमने - मैंने
इस गुलमोहर के तले!
तुम्हारी गोद में सिर रखकर
जब मैं गुलमोहर निहारा करती थी
गिरती थी जो लाल- लाल पंखुड़ियां
उनसे खेला करती थी!
तुम देते थे उपमा मेरी उन फूलों की लाली से
और मैं हुई जाती लाल शर्म से
तुम्हार मीठी बाती से!
आज भी जाने कौन सा जादू छिपा है
उसकी खुश्बू में
सारी बातें खुद में समेटे खड़ा है गुलमोहर
बाहें फैलाये
मानो कर रहा वो इंतजार
मेरा-तुम्हारा!
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